आईपीएल 2026: भ्रम, अव्यवस्था और ठंडी पड़ चुकी उम्मीदों के बीच खत्म हुआ लखनऊ सुपर जायंट्स का सीजन!

जब लखनऊ सुपर जायंट्स ने आईपीएल के अनुभवी कोच टॉम मूडी और पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कोच जस्टिन लैंगर को सपोर्ट स्टाफ में शामिल किया था, तब उम्मीद थी कि टीम अब एक प्रतिभाशाली लेकिन अस्थिर टीम से आगे बढ़कर असली खिताब की दावेदार बनेगी।

लेकिन इसके बजाय पूरा सीजन खराब फैसलों, अजीब टीम कॉम्बिनेशन और लगातार बदलती प्लेइंग इलेवन के बीच उलझा रहा। ऐसा लगा जैसे टीम खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि उसकी सबसे मजबूत टीम कौन-सी है।

लंबे समय तक ऐसा महसूस हुआ कि कप्तान ऋषभ पंत और कोच लैंगर अलग-अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं। बल्लेबाज़ी क्रम में लगातार बदलाव, खिलाड़ियों को बार-बार बाहर करना और हार के बाद खिलाड़ियों की बॉडी लैंग्वेज साफ दिखा रही थी कि टीम पूरी तरह भ्रम में है।

सबसे ज्यादा चर्चा मालिक संजीव गोयनका के उस फैसले की रही, जिसमें उन्होंने ऋषभ पंत को 27.50 करोड़ रुपये में खरीदा। पंत भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारे और मैच विनर हैं, लेकिन इतनी बड़ी रकम खर्च करने से टीम का संतुलन बिगड़ गया और कुछ अहम जगहें कमजोर रह गईं।

टीम की सबसे बड़ी कमजोरी विदेशी तेज गेंदबाज़ों की कमी रही। दक्षिण अफ्रीका के एनरिच नॉर्टरिज को छोड़ दें, जिन्होंने सिर्फ एक मैच खेला, तो LSG के पास ऐसा कोई विदेशी तेज गेंदबाज़ नहीं था जो मैच का रुख बदल सके। इसका पूरा दबाव युवा भारतीय गेंदबाज़ों पर आ गया।

मोहम्मद शमी कुछ मैचों में ही असरदार दिखे, जबकि घरेलू गेंदबाज़ों में सिर्फ मोहसिन खान (11 विकेट) और प्रिंस यादव (16 विकेट) ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। बाकी गेंदबाज़ संघर्ष करते नजर आए।

तेज गेंदबाज़ मयंक यादव सर्जरी के बाद सिर्फ चार मैच खेल पाए। उन्होंने एक भी विकेट नहीं लिया और उनका इकॉनमी रेट 11 से ऊपर रहा। युवा बाएं हाथ के गेंदबाज़ आकाश सिंह ने एक मैच में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन अगले मैच में महंगे साबित हुए और फिर वापसी नहीं कर पाए।

इतनी परेशानियों के बावजूद LSG लगातार ऐसे कॉम्बिनेशन आज़माती रही जिनसे सवाल ज्यादा उठे और जवाब कम मिले। निकोलस पूरन को लगातार मौके दिए गए, जबकि उनका प्रदर्शन लगातार खराब होता जा रहा था। किसी खिलाड़ी को समर्थन देना अच्छी बात है, लेकिन एक समय के बाद वह जिद जैसा लगने लगता है।

टीम के अभियान का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि प्लेऑफ की उम्मीदें खत्म होने के बाद भी कुछ नए खिलाड़ियों को मौका नहीं दिया गया। इसी वजह से सवाल उठा कि आखिर टॉम मूडी और जस्टिन लैंगर ने अर्जुन तेंदुलकर को एक भी मैच क्यों नहीं खिलाया।

क्या वह आकाश सिंह या आवेश खान से भी खराब प्रदर्शन करते? आवेश लगभग दस साल से आईपीएल खेल रहे हैं, लेकिन दबाव में उनका प्रदर्शन ज्यादा प्रभावी नहीं रहा।

विडंबना यह रही कि LSG की सोशल मीडिया टीम लगातार “अर्जुन तेंदुलकर यॉर्कर पैकेज” जैसे वीडियो प्रमोट करती रही, जिससे काफी चर्चा और व्यूज़ मिले। लेकिन अगर उनकी यॉर्कर इतनी अच्छी थीं, तो उन्हें मैदान पर मौका क्यों नहीं मिला?

या फिर मशहूर उपनाम सिर्फ सोशल मीडिया और डिजिटल पहुंच बढ़ाने के लिए इस्तेमाल हो रहा था?

भारतीय क्रिकेट में जहां नेपोटिज्म पर बहस होती रहती है, वहीं अर्जुन तेंदुलकर का मामला उल्टा नजर आता है — टीम में चुने जाते हैं, लेकिन प्लेइंग इलेवन में भरोसा नहीं दिखाया जाता।

यह भी साफ नहीं हो पाया कि लैंगर या मूडी ने अर्जुन को कभी बताया भी या नहीं कि उन्हें मौका क्यों नहीं मिल रहा। खासकर तब, जब अरशिन कुलकर्णी जैसे खिलाड़ी, जिन्होंने 24 गेंदों में सिर्फ 17 रन बनाए और टी20 के लिए फिट नहीं लगे, फिर भी ओपनिंग करने भेजे गए।

आखिर में, LSG का यह सीजन सिर्फ हार के लिए याद नहीं रखा जाएगा। इसे शायद उस अभियान के तौर पर याद किया जाएगा, जिसमें टीम मैनेजमेंट अपनी क्रिकेटिंग पहचान बनाने में पूरी तरह नाकाम रहा।