
फीफा वर्ल्ड कप को 48 टीमों तक बढ़ाने से उन महाद्वीपों को ज्यादा मौके मिले हैं, जिन्हें पहले टूर्नामेंट में कम प्रतिनिधित्व मिलता था। लेकिन क्वार्टर फाइनल की लाइनअप को देखने पर एक पुरानी कहानी फिर दोहराती नजर आ रही है।
मौजूदा चैंपियन लियोनेल मेसी की अर्जेंटीना और मोरक्को ही अंतिम आठ में बची हुई गैर-यूरोपीय टीमें हैं। वहीं फ्रांस, स्पेन, बेल्जियम, इंग्लैंड, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड अब भी खिताब की दौड़ में हैं, जिससे 2018 की तरह सभी सेमीफाइनलिस्ट यूरोपीय होने की संभावना बनी हुई है।
1990 में इटली में हुए वर्ल्ड कप में 24 में से 14 स्थान यूरोपीय टीमों के पास थे, लेकिन हाल के दशकों में यह संख्या घटकर 48 में से 16 हो गई है। दूसरी तरफ अफ्रीका की टीमों की संख्या 2022 कतर वर्ल्ड कप की पांच टीमों से बढ़कर अब 10 हो गई है। इस कारण दुनिया के बाकी हिस्सों को ज्यादा जगह मिली है।
हालांकि, टूर्नामेंट के निर्णायक दौर में एक बार फिर यूरोप ही आगे दिखाई दे रहा है। इस बार क्वार्टर फाइनल में छह यूरोपीय टीमें पहुंची हैं, जबकि चार साल पहले यह संख्या पांच थी। 2002 वर्ल्ड कप इसका अपवाद रहा था, जब सिर्फ चार यूरोपीय टीमें क्वार्टर फाइनल में पहुंची थीं।
दुनिया के ज्यादातर बड़े फुटबॉल खिलाड़ी यूरोप की शीर्ष लीगों में खेलते हैं, जहां पैसा और सुविधाएं सबसे ज्यादा हैं। पश्चिमी यूरोप की अकादमियों में बेहतरीन कोच युवा खिलाड़ियों को तैयार करते हैं और कई देशों को इसका फायदा मिला है।
अफ्रीका की आखिरी बची टीम मोरक्को ने दोहरी रणनीति के जरिए खुद को एक मजबूत टीम बनाया है। 2022 में पहली बार वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में पहुंचने वाली अफ्रीकी टीम बनने के बाद मोरक्को अब एक बड़ी ताकत बन चुका है।
टीम के कई खिलाड़ी, जैसे प्लेमेकर अजेदीन ओनाही, रबात के पास स्थित आधुनिक मोहम्मद VI अकादमी से निकले हैं।
हालांकि, टीम के ज्यादातर खिलाड़ी पश्चिमी यूरोप में पैदा हुए और वहीं की फुटबॉल अकादमियों में तैयार हुए हैं। इनमें कप्तान अचरफ हकीमी, स्पेन में जन्मे ब्राहिम डियाज, नीदरलैंड में जन्मे नौसैर मज़रावी और फ्रांस में जन्मे अयूब बौअद्दी जैसे नाम शामिल हैं।
टूर्नामेंट के पहले मैच में ब्राजील के खिलाफ 1-1 ड्रॉ के दौरान मोरक्को वर्ल्ड कप इतिहास की पहली ऐसी टीम बनी जिसने एक समय पूरी विदेशी मूल के खिलाड़ियों वाली प्लेइंग 11 उतारी।
अब मोरक्को के पास 2022 के अपने ऐतिहासिक सेमीफाइनल प्रदर्शन को दोहराने या उससे आगे जाने का मौका है।
इस वर्ल्ड कप में चुने गए लगभग 25 प्रतिशत खिलाड़ियों ने उस देश का प्रतिनिधित्व किया जहां उनका जन्म नहीं हुआ था। इनमें से कई खिलाड़ी यूरोप में पैदा हुए लेकिन उन्होंने किसी दूसरे देश के लिए खेलने का फैसला किया।
अर्जेंटीना की स्थिति अलग है। उसके ज्यादातर खिलाड़ी देश में ही पैदा हुए हैं, हालांकि कई खिलाड़ियों को कम उम्र में ही यूरोपीय क्लबों ने अपने साथ जोड़ लिया था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मेसी हैं, जो किशोर उम्र में ही बार्सिलोना चले गए थे।
ब्राजील के ज्यादातर खिलाड़ी भी यूरोप में खेलते हैं, लेकिन 1990 के बाद यह पहला वर्ल्ड कप है जिसमें टीम क्वार्टर फाइनल तक नहीं पहुंच पाई।
ऐसा यूरोपीय कोच कार्लो एंसेलोटी को नियुक्त करने के बावजूद हुआ। सोच यही थी कि अगर आप उन्हें हरा नहीं सकते तो उनके तरीके अपनाएं। लेकिन राउंड ऑफ 16 में नॉर्वे से मिली हार के बाद ब्राजील का यूरोपीय टीमों के खिलाफ नॉकआउट मुकाबलों में खराब रिकॉर्ड जारी रहा। 2002 में खिताब जीतने के बाद से ब्राजील हर बार यूरोपीय विरोधियों से हारकर बाहर हुआ है।
वहीं अमेरिका के लिए यह वर्ल्ड कप 2002 की तरह कम से कम क्वार्टर फाइनल में पहुंचने का बेहतरीन मौका माना जा रहा था, लेकिन बेल्जियम ने उसे 4-1 से हराकर बाहर कर दिया।
एशिया की रिकॉर्ड नौ टीमों ने इस बार हिस्सा लिया, लेकिन केवल ऑस्ट्रेलिया और जापान ही ग्रुप स्टेज से आगे बढ़ पाए।
कोलंबिया से भी काफी उम्मीदें थीं, लेकिन एक और छोटे पश्चिमी यूरोपीय देश स्विट्जरलैंड ने पेनल्टी शूटआउट में उसे हराकर बाहर कर दिया।
स्विट्जरलैंड 1954 के बाद पहली बार क्वार्टर फाइनल में पहुंचा है और टीम को भरोसा है कि यूरोप की मजबूत टीमों के खिलाफ खेलने और मुकाबला करने का अनुभव उन्हें अर्जेंटीना के खिलाफ चुनौती पेश करने में मदद करेगा।








