हर दिन 100 ओवर खेलने की मेहनत ने गढ़ी वैभव सूर्यवंशी की सफलता की कहानी!

पिछले दो आईपीएल सीजन में वैभव सूर्यवंशी की विस्फोटक बल्लेबाजी ने क्रिकेट जगत को हैरान कर दिया है, लेकिन उनके शानदार शॉट्स और बड़े रनों के पीछे छह वर्षों की कड़ी मेहनत और अनुशासन छिपा हुआ है।

वैभव के बचपन के कोच मनीष ओझा ने खुलासा किया कि युवा बल्लेबाज रोज़ाना लगभग आठ घंटे अभ्यास करता था और इस दौरान करीब 100 ओवर यानी 600 से अधिक गेंदों का सामना करता था।

15 साल की उम्र में ही विश्व क्रिकेट के सबसे चर्चित युवा बल्लेबाज बन चुके वैभव ने आईपीएल 2026 में 776 रन बनाकर ऑरेंज कैप जीती। उनका स्ट्राइक रेट 237 से अधिक रहा। शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें भारत की टी20 टीम में इंग्लैंड दौरे के लिए भी चुना गया है।

मनीष ओझा ने बताया कि उन्होंने वैभव को पटना स्थित अपनी अकादमी में तब ट्रेनिंग देना शुरू किया था जब वह केवल आठ साल के थे। उन्होंने वैभव की मेहनत और उनके माता-पिता संजय सूर्यवंशी और आरती देवी के त्याग की भी जमकर सराहना की।

ओझा ने कहा कि आज वैभव की सफलता देखकर माता-पिता अपने पांच-पांच साल के बच्चों को भी अकादमियों में लेकर आ रहे हैं ताकि वे भी अगला वैभव बन सकें। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा करना जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं।

ओझा ने बताया, “हम गेंदें नहीं गिनते थे, लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि वैभव हर दिन कम से कम 600 गेंदों का सामना करता था।”

उन्होंने विस्तार से बताया कि अभ्यास के दौरान वह खुद 200 से 300 गेंदों के थ्रोडाउन देते थे। जब वे थक जाते तो सपोर्ट स्टाफ मदद करता और उसके बाद अकादमी के गेंदबाज बारी-बारी से वैभव को गेंदबाजी करते थे।

“कई बार गेंदबाज भी थक जाते थे, तो उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटकर गेंदबाजी कराई जाती थी। नेट्स, थ्रोडाउन और कभी-कभी बॉलिंग मशीन—वैभव हर तरह की गेंदों का सामना करता था। यह अभ्यास सुबह 7:30 बजे शुरू होकर शाम 4 बजे तक चलता था।”

ओझा का मानना है कि लगातार छह साल तक एक ही तरह की मेहनत और तकनीकी सुधार पर ध्यान देने से वैभव के अंदर अद्भुत ‘मसल मेमोरी’ विकसित हुई।

उन्होंने कहा, “जब आप किसी कौशल को बार-बार दोहराते हैं, सही तकनीक पर काम करते हैं और एक समर्पित कोच के मार्गदर्शन में अभ्यास करते हैं, तो उसका सकारात्मक परिणाम जरूर मिलता है। वैभव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।”

ओझा ने कहा कि वैभव की सफलता में उनके माता-पिता की भूमिका बेहद अहम रही है।

“माता-पिता के सहयोग के बिना कुछ भी संभव नहीं है। बिहार में कई कोच थे, लेकिन संजीव जी ने मुझे चुना। उस समय मैं कोई बहुत बड़ा या मशहूर कोच नहीं था। यह मेरे लिए सम्मान की बात थी कि समस्तीपुर से एक छोटा बच्चा सिर्फ मेरी ट्रेनिंग के लिए पटना आ रहा था।”

उन्होंने याद करते हुए बताया कि समस्तीपुर से पटना आने में ढाई घंटे लगते थे और वैभव रोज अपने पिता के साथ यह सफर तय करते थे।

वैभव की मां आरती देवी के समर्पण का जिक्र करते हुए ओझा भावुक हो गए।

उन्होंने कहा, “उनकी मां रात 2 या 2:30 बजे उठ जाती थीं और खाना बनाती थीं। सिर्फ वैभव, उनके पिता और ड्राइवर के लिए नहीं, बल्कि उन गेंदबाजों और बच्चों के लिए भी जो उनके साथ अभ्यास करते थे।”

“अकादमी में कई ऐसे बच्चे थे जिन्हें घर से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता था। वैभव का परिवार उनके लिए भी खाना लेकर आता था। कई बार गेंदबाज अपना खाना भूल जाते थे तो वही खाना सब मिलकर खाते थे। सोचिए, रोज़ सुबह 2 बजे उठकर 10-15 लोगों के लिए खाना बनाना कितना बड़ा योगदान है।”

ओझा के अनुसार, वैभव की सफलता ने देशभर के माता-पिता और बच्चों को प्रेरित किया है।

उन्होंने कहा, “आज पांच साल के बच्चों के माता-पिता भी अकादमी लेकर आ रहे हैं। वैभव पूरे भारत के माता-पिता और बच्चों के लिए प्रेरणा बन चुका है। वह एक रोल मॉडल बन गया है।”