
बचपन में मुकुल चौधरी महेंद्र सिंह धोनी को मैच फिनिश करते देखते थे और सपना देखते थे कि एक दिन वे भी ऐसा कर पाएंगे।
राजस्थान के 21 वर्षीय इस युवा बल्लेबाज ने गुरुवार रात ईडन गार्डन्स में उस सपने को हकीकत में बदल दिया, जब उन्होंने शानदार छक्कों की बारिश करते हुए लखनऊ सुपर जायंट्स को कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाफ आखिरी गेंद पर तीन विकेट से जीत दिलाई।
मुकुल ने मैच के बाद कहा, “मैं यह पारी अपने पिता को समर्पित करता हूं। उन्होंने शादी से पहले ही सपना देखा था कि उनका बेटा क्रिकेटर बनेगा। मैं एमएस धोनी सर को हमेशा देखता हूं कि वह कैसे मैच खत्म करते हैं। मैं भी उसी नंबर पर खेलता हूं, इसलिए यह उनके नाम भी है।”
(54* रन, 27 गेंद, 2 चौके, 7 छक्के)
इस आत्मविश्वास के पीछे उनकी कड़ी मेहनत है। मुकुल रोजाना करीब 100-150 छक्के लगाने की प्रैक्टिस करते हैं।
उन्होंने कहा, “मेरे शॉट्स में पावर है और मैं बहुत अभ्यास करता हूं। पिछले पांच-छह महीनों से मैंने काफी मेहनत की है और उसका फायदा अब दिख रहा है।”
मुकुल ने बताया कि उन्होंने 17वें ओवर में वैभव अरोड़ा को जो छक्का लगाया, वह “हेलीकॉप्टर शॉट” था, जो धोनी की याद दिलाता है।
“मैंने यह शॉट बचपन से प्रैक्टिस किया है। मुझे हमेशा पसंद रहा है कि धोनी कैसे यॉर्कर पर भी छक्का मारते थे। इससे गेंदबाज पर दबाव बनता है।”
एलएसजी के कोच जस्टिन लैंगर, जिन्होंने पहले ही मुकुल को भारत के “सबसे खतरनाक” मिडिल ऑर्डर बल्लेबाजों में से एक बनने की क्षमता वाला बताया था, उनकी इस पारी से काफी प्रभावित हुए।
मुकुल ने कहा, “अगर इतना बड़ा कोच आपके बारे में कुछ कहता है, तो जरूर उसने आपमें कुछ देखा होगा। उन्होंने मुझ पर भरोसा दिखाया और मैं उसे सही साबित करना चाहता था। उन्होंने मुझे रोज 10-15 मिनट प्रैक्टिस करवाई और बहुत कुछ सिखाया।”
सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में दिल्ली के खिलाफ एक मैच में मुकुल को आखिरी ओवर में 25 रन चाहिए थे। उन्होंने लगभग असंभव को संभव कर दिया था और उसी पारी के बाद वह आईपीएल टीमों की नजर में आए। बाद में एलएसजी ने उन्हें 2.60 करोड़ रुपये में खरीदा।
मुकुल ने कहा, “उस मैच में आखिरी ओवर में 25 रन चाहिए थे और आखिरी गेंद पर 5 रन। उसी पारी से मुझे विश्वास मिला और मुझे चुना गया।”
मुकुल का कहना है कि उनका फोकस सिर्फ मैच को अंत तक ले जाने पर रहता है।
“मैंने कभी रिजल्ट के बारे में नहीं सोचा। बस मैच को अंत तक ले जाना चाहता था। मुझे विश्वास था कि अगर अंत तक खेलूंगा तो टीम को जीत दिला सकता हूं।”
उन्होंने बताया कि दबाव में शांत रहने के लिए वह गहरी सांस लेने की तकनीक अपनाते हैं।
“जब बहुत कुछ चल रहा होता है, तो मैं कुछ सेकंड शांत होकर 2-3 गहरी सांस लेता हूं, गेंद को देखता हूं और फिर खेलता हूं।”
मुकुल की इस सफलता के पीछे उनके परिवार का बड़ा योगदान है। उनके पिता दलिप ने बेटे को क्रिकेटर बनाने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी, घर का हिस्सा बेच दिया और जगह बदल ली। उनकी मां सुनीता ने भी अपना पूरा जीवन बेटे के क्रिकेट के अनुसार ढाल लिया।
मुकुल ने जयपुर के अरावली कोचिंग सेंटर में मीडियम पेसर के रूप में शुरुआत की थी।
उन्होंने कहा,
“मैं मीडियम पेसर था, फिर कीपिंग करने लगा क्योंकि कोई नहीं था। बाद में कोच ने मेरी बल्लेबाजी देखी और मुझे बैटिंग पर ध्यान देने को कहा।”
हालांकि घरेलू क्रिकेट में उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
अब बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद मुकुल जमीन से जुड़े हुए हैं।
“हां, दबाव होता है। यह मेरा पहला सीजन है। लेकिन मैं प्रक्रिया पर ध्यान देता हूं। अगर यहां अच्छा प्रदर्शन करेंगे तो एक अलग पहचान मिलेगी।”
उन्होंने अंत में कहा, “दबाव हर किसी पर होता है, चाहे आप 5 मैच खेलें या 50। जरूरी है कि आप खुद पर भरोसा रखें और सीखते रहें।”








