
इस साल दूर बसे बाटूमी में महिला शतरंज विश्व कप जीतने वाली तेज़-तर्रार युवा खिलाड़ी दिव्या देशमुख की शानदार सफलता ने न सिर्फ खेल में भारत की गहरी प्रतिभा को उजागर किया, बल्कि देश को शतरंज के नए वैश्विक केंद्र के रूप में भी स्थापित कर दिया।
नागपुर की 19 वर्षीय दिव्या अचानक सुर्खियों में आईं और एक ही यादगार जीत के साथ अपने करियर की तीन बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लीं—वह भी ऐसे समय में, जब 2024 के विश्व चैंपियन डी. गुकेश की आभा इस साल की कुछ हारों के बाद थोड़ी फीकी पड़ती दिख रही थी।
दिव्या न सिर्फ FIDE महिला विश्व कप जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं, बल्कि उन्होंने बिना पारंपरिक “नॉर्म्स” पूरे किए सीधे ग्रैंडमास्टर का प्रतिष्ठित खिताब भी हासिल कर लिया।
डॉक्टर माता-पिता की बेटी दिव्या ने इसके साथ ही 2026 कैंडिडेट्स टूर्नामेंट में सीधा प्रवेश भी पा लिया, जहां विजेता को मौजूदा महिला विश्व चैंपियन चीन की जू वेनजुन को चुनौती देने का मौका मिलेगा।
जुलाई के उस ऐतिहासिक दिन दिव्या की जीत ने भारत में महिला शतरंज की तस्वीर ही बदल दी। अब तक यह क्षेत्र दो बार की वर्ल्ड रैपिड चैंपियन कोनेरू हम्पी और द्रोणावल्ली हरिका पर निर्भर रहा था, जिन्होंने करीब दो दशकों तक भारतीय महिला शतरंज की अगुवाई की।
जहां दिव्या की जीत ने गहरी छाप छोड़ी, वहीं विश्व चैंपियन गुकेश का साल मिला-जुला रहा। नीदरलैंड्स के वाइक आन ज़ी में टाटा स्टील चेस मास्टर्स में दूसरे स्थान से साल की शुरुआत अच्छी रही, लेकिन इसके बाद नतीजे निराशाजनक रहे।
विश्व खिताब जीतने के बाद गुकेश का सफर आसान नहीं रहा। उनके वर्चस्व को हमवतन आर. प्रज्ञानानंदा ने चुनौती दी, जिन्होंने रोमांचक ब्लिट्ज़ टाईब्रेक में गुकेश को हराकर टाटा स्टील मास्टर्स का खिताब जीता।
19 वर्षीय गुकेश का यह साल, जो उनके विश्व खिताब को और मजबूत करने वाला होना चाहिए था, उतार-चढ़ाव से भरा रहा। वह फ्रीस्टाइल चेस ग्रैंड स्लैम से बाहर हुए, FIDE ग्रैंड स्विस में खराब प्रदर्शन किया और गोवा में हुए FIDE वर्ल्ड कप के तीसरे राउंड में चौंकाने वाली हार झेली।
इस मुश्किल साल में कुछ उजली झलकियां भी रहीं—मई–जून में नॉर्वे चेस में विश्व नंबर एक मैग्नस कार्लसन पर ऐतिहासिक जीत और अक्टूबर में यूरोपियन क्लब कप, जहां गुकेश ने व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता और अपनी टीम सुपरचेस को खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
स्टावेंगर में नॉर्वे चेस के दौरान कार्लसन पर गुकेश की जीत उनके करियर की यादगार उपलब्धियों में से एक रही, जिसने तमाम निराशाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को आसमान पर पहुंचा दिया।
इस जीत के बाद सोशल मीडिया पर तहलका मच गया। मुकाबले में हार से बौखलाए कार्लसन ने मेज़ पर मुक्का मारा, “ओह माय गॉड” चिल्लाए और हॉल से बाहर निकल गए—यह दृश्य वायरल हो गया।
यहां तक कि फ्रांस के फुटबॉल दिग्गज पेरिस सेंट-जर्मेन (PSG) ने भी इस मौके का इस्तेमाल किया। PSG ने गुकेश की शांत मुद्रा वाली तस्वीर ट्वीट करते हुए लिखा— “हमारा पहला UCL जीतने पर ऐसा महसूस हुआ।”
इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर 80 लाख से ज्यादा इम्प्रेशंस मिले।
हालांकि गुकेश से हारने के बावजूद कार्लसन ने एक और बड़े प्रतिद्वंद्वी को हराकर अपना आठवां नॉर्वे चेस खिताब जीता और विभिन्न फॉर्मेट्स में अपनी बादशाहत कायम रखी।
हाल ही में गोवा में हुए वर्ल्ड कप में उम्मीद थी कि भारत कम से कम कैंडिडेट्स में एक जगह पक्की करेगा, लेकिन घरेलू फायदा होने के बावजूद यह मुमकिन नहीं हो सका। प्रज्ञानानंदा, अर्जुन एरिगैसी, निहाल सरीन, पी. हरिकृष्णा और विदित गुजराती जैसे दावेदार अलग-अलग चरणों में बाहर हो गए।
बाद में आंद्रेई एसिपेंको, वेई यी और जावोखिर सिंदारोव ने अगले साल साइप्रस में होने वाले कैंडिडेट्स के लिए अपनी जगह पक्की की।
हालांकि अंततः प्रज्ञानानंदा ने FIDE सर्किट 2025 जीतकर कैंडिडेट्स में जगह बना ली। लंदन चेस क्लासिक जैसे टूर्नामेंट्स में शानदार प्रदर्शन के दम पर वह विश्व चैंपियनशिप क्वालिफायर के लिए क्वालिफाई करने वाले पहले भारतीय पुरुष खिलाड़ी बने।
1988 में विश्वनाथन आनंद के भारत के पहले ग्रैंडमास्टर बनने के बाद से देश ने लंबी छलांग लगाई है। 2026 की ओर बढ़ते हुए, भारत के पास अब 91 ग्रैंडमास्टर्स हैं, जिनमें से कई इस प्रतिष्ठित खिताब के बेहद करीब हैं।
साल 2025 में एल. आर. श्रीहरि, हरिकृष्णन ए. रा, दिव्या देशमुख, एस. रोहित कृष्णा, इलमपार्थी ए. आर. और राहुल वी. एस. ग्रैंडमास्टर बने।
रिकॉर्ड टूटना अब बस समय की बात लगती है, क्योंकि मध्य प्रदेश के सर्वज्ञ सिंह कुशवाहा महज़ 3 साल, 7 महीने और 20 दिन की उम्र में FIDE रेटिंग सूची में शामिल होने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गए हैं—इतने “छोटे” कि यकीन करना भी मुश्किल हो!








