
शुक्रवार सुबह पर्थ में एशेज़ का मुकाबला देखते हुए, “जलन” महसूस कर रहे टेम्बा बवुमा ने सवाल उठाया कि पारंपरिक फॉर्मेट में वर्तमान विश्व चैंपियन होने के बावजूद दक्षिण अफ्रीका को भारत के खिलाफ सिर्फ 2 टेस्ट की सीरीज़ क्यों मिली।
इस साल की शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका को डब्ल्यूटीसी चैंपियन बनाने वाले बवुमा का कहना है कि दो बेहतरीन रेड-बॉल टीमों के बीच इतनी छोटी सीरीज़ खेलवाना इस मुकाबले के स्तर के साथ न्याय नहीं करता।
बवुमा ने कहा, “हम सुबह उठकर एशेज़ देख रहे थे। थोड़ी जलन भी हुई, क्योंकि वे 5 टेस्ट खेल रहे हैं। वे एक-दूसरे से जमकर भिड़ेंगे। उम्मीद है कि बहुत दूर भविष्य में नहीं, बल्कि जल्द ही हमें भारत के खिलाफ चार टेस्ट खेलने मिलेंगे।”
बवुमा यह भी समझते हैं कि खिलाड़ियों का “शेड्यूल मैपिंग” में कोई रोल नहीं होता। किसी भी देश की टेस्ट सीरीज़ की लंबाई सीधे उसकी वाणिज्यिक क्षमता पर निर्भर करती है।
इसी वजह से एशेज़, बॉर्डर–गावस्कर ट्रॉफी और एंडरसन–तेंदुलकर ट्रॉफी 5 मैचों की सीरीज़ होती हैं।
लेकिन भारत बाकी टीमों—बांग्लादेश, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और वेस्टइंडीज़—के साथ आमतौर पर 2 टेस्ट की ही सीरीज़ खेलता है।
बवुमा ने कहा, “शेड्यूल बनाने में खिलाड़ी शामिल नहीं होते। हमारे हर खिलाड़ी ने मीडिया से बात करते हुए इस मुद्दे पर अपनी नाराज़गी जताई है।”
उन्होंने बताया कि 2 टेस्ट की सीरीज़ रोमांच को कम कर देती है, क्योंकि सीरीज़ ड्रॉ होने की संभावना बहुत अधिक रहती है।
बवुमा बोले, “चाहे सीरीज़ 1-1 रहे या 2-0, भारत जैसी मज़बूत टीम के खिलाफ 3 टेस्ट होना चाहिए। इससे दर्शकों को अच्छा क्रिकेट देखने मिलता है—कभी एक टीम हावी, कभी दूसरी। और सबसे ज़रूरी बात, किसी एक टीम के जीतकर निकलने की गुंजाइश रहती है।”
फिर भी, दक्षिण अफ्रीका के प्रेरणादायी कप्तान का मानना है कि वे केवल मैदान पर अच्छा खेलकर ही बदलाव लाने के लिए मजबूर कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, “जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, खिलाड़ी सिर्फ मैदान पर अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। अच्छा क्रिकेट खेलते रहेंगे, तो बड़ी टीमें हमारे खिलाफ ज़्यादा टेस्ट खेलने को मजबूर होंगी।”








