
जहां पूरा भारत युवा बल्लेबाजी प्रतिभा वैभव सूर्यवंशी की शानदार प्रगति की तारीफ कर रहा है और उनके अंतरराष्ट्रीय डेब्यू का बेसब्री से इंतजार कर रहा है, वहीं एक और महत्वपूर्ण चर्चा भी चल रही है, जो उनकी आक्रामक बल्लेबाजी और असाधारण प्रतिभा से कहीं आगे की है।
कई वर्षों से शीर्ष स्तर के खेलों में यह सवाल बना हुआ है कि जब कोई असाधारण प्रतिभाशाली बच्चा कम उम्र में ही बड़े मंच पर पहुंच जाता है, तो उसकी प्रतिभा को आगे बढ़ाते हुए उसका सामान्य बचपन कैसे सुरक्षित रखा जाए। इसका कोई आसान जवाब नहीं है।
अगर चयन केवल प्रदर्शन के आधार पर हो, तो सूर्यवंशी निश्चित रूप से इस मुकाम के हकदार हैं। आईपीएल और अन्य टूर्नामेंटों में उनके हालिया प्रदर्शन ने इस बात को मजबूती से साबित किया है। लेकिन उनके पहले सीनियर दौरे की तैयारियां यह भी याद दिलाती हैं कि क्रिकेट का ये नया सेंसेशन अभी भी कानून के हिसाब से नाबालिग है।
इंग्लैंड में सुरक्षा नियमों के चलते युवा खिलाड़ियों के लिए अलग चेंजिंग रूम की व्यवस्था जरूरी होती है, वहीं बीसीसीआई ने उनके माता-पिता को उनके साथ रहने की अनुमति दी है। वह एक ऐसा लड़का है जो अंतरराष्ट्रीय तेज गेंदबाजों का सामना करने के लिए काफी मैच्योर है, लेकिन उम्र के हिसाब से अभी भी उस सुरक्षा और देखभाल का हकदार है जो बचपन के साथ आती है।
प्रसिद्ध स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट कीर्तना स्वामीनाथन का मानना है कि इस अंतर को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
उन्होंने PTI से कहा, “15 साल का बच्चा स्टार बनने से पहले एक बच्चा होता है। लेकिन हम इसे उल्टा समझने लगते हैं। हम पहले उसे स्टार और फिर बच्चा मानने लगते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “हमें समझना होगा कि हम एक बच्चे से कितनी उम्मीद रख सकते हैं। जाहिर है, उसे गलतियां करने की जगह मिलनी चाहिए।”
“यह समझना बहुत जरूरी है कि वे पहले बच्चे हैं और बाद में परफॉर्मर। क्योंकि जब वे प्रदर्शन कर रहे होते हैं, तो उन्हें पहले से ही कई चीजों से जूझना पड़ता है। उन्हें अपनी इमोशनल और मानसिक स्थिरता पर भी काम करना होता है। यह बहुत ज्यादा दबाव वाली स्थिति होती है।”
शायद यही बात इस पूरी चुनौती को सबसे बेहतर तरीके से समझाती है। हर पीढ़ी ने ऐसे बच्चों को देखा है जो क्रिकेट, फुटबॉल, टेनिस और जिमनास्टिक जैसे खेलों में अपने से कहीं ज्यादा उम्र और ताकतवर खिलाड़ियों से मुकाबला करते हैं। कुछ खिलाड़ी इन उम्मीदों पर खरे उतरते हैं, जबकि कुछ के लिए कम उम्र की प्रसिद्धि का मानसिक दबाव संभालना मुश्किल हो जाता है।
भारतीय क्रिकेट में पहले भी कम उम्र में खिलाड़ियों ने डेब्यू किया है। सचिन तेंदुलकर केवल 16 साल के थे जब उन्होंने 1989 में पाकिस्तान के खतरनाक गेंदबाजी आक्रमण का सामना किया था। बाद में वह अपने दौर के महानतम बल्लेबाजों में शामिल हुए। लेकिन सचिन का दौर अलग था।
तब न तो 24 घंटे चलने वाला मीडिया था, न हर पल राय देने वाला सोशल मीडिया और न ही हर पारी का तुरंत विश्लेषण करने वाले वीडियो क्लिप। तारीफ धीरे आती थी और आलोचना भी धीरे पहुंचती थी।
आज के युवा खिलाड़ी ऐसे दौर में आगे बढ़ रहे हैं जहां उनका हर शॉट, हर आउट और हर प्रतिक्रिया कुछ ही मिनटों में चर्चा का विषय बन सकती है। स्वामीनाथन के अनुसार, इससे मानसिक चुनौती पूरी तरह बदल जाती है।
उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि सिर्फ बचाना ही समाधान है। अब जब वह इस माहौल का हिस्सा है, तो मीडिया बात करेगा, सोशल मीडिया बात करेगा और लोग अपनी राय देंगे। माता-पिता बच्चे की उदासी या गुस्सा खत्म नहीं कर सकते, लेकिन वे उसका सहारा बन सकते हैं और उसे उन भावनाओं से निपटना सिखा सकते हैं।”
क्रिकेट में युवा प्रतिभाओं का सफर हमेशा एक जैसा नहीं रहा है। सचिन जैसे खिलाड़ियों ने उम्मीदों को पूरा किया, लेकिन कुछ खिलाड़ी जैसे पृथ्वी शॉ शुरुआती सफलता के बाद लंबे समय तक उसी स्तर को बनाए रखने में संघर्ष करते नजर आए। इससे पता चलता है कि शुरुआती प्रतिभा हमेशा लंबे करियर की गारंटी नहीं होती।
स्वामीनाथन का मानना है कि जिम्मेदारी सिर्फ खिलाड़ी की नहीं होती। माता-पिता, कोच और खेल व्यवस्था को भी समझना चाहिए कि बच्चे सफलता और असफलता को वयस्कों से अलग तरीके से महसूस करते हैं।
उन्होंने कहा, “मैंने माता-पिता और कोचों के साथ काफी काम किया है। मेरा विश्वास ऐसे माहौल बनाने में है जहां खिलाड़ी और बच्चे बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकें। कई बार संवाद में कमी आ जाती है। हम बच्चों से ऐसे बात करने लगते हैं जैसे वे 20 या 30 साल के हों, जबकि हम भूल जाते हैं कि वे सिर्फ 15 साल के हैं।”
उन्होंने एक युवा खिलाड़ी की बात याद करते हुए बताया, “उसने मुझसे कहा, ‘मैम, मैं समझ नहीं पाता कि मेरे माता-पिता खुश हैं या नहीं। जब मैं अच्छा खेलता हूं तो कभी-कभी वे नाराज होते हैं, और जब अच्छा नहीं खेलता तो कहते हैं कि मैंने अच्छा किया। मैं समझ नहीं पाता।'”
उनके अनुसार, ये उदाहरण बताते हैं कि बड़े लोग कई बार भूल जाते हैं कि किशोरावस्था इमोशनल विकास का समय होता है। बच्चों को हर मुश्किल से बचाने के साथ-साथ उन्हें अपनी भावनाओं को समझना भी सिखाना जरूरी है।
उन्होंने कहा, “अगर बच्चा दुख महसूस कर रहा है, तो उसे उस भावना का उपयोग करना सीखना चाहिए। खुद का आकलन करना एक बड़ी क्षमता है। लोग सोचते हैं कि भावुक होना गलत है, लेकिन भावनाएं किसी कारण से होती हैं। वे सबसे बड़ी शिक्षक बन सकती हैं।”
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वैभव सूर्यवंशी जैसी प्रतिभा की उपलब्धियों को कम करके देखा जाए या सिर्फ उम्र के कारण उन्हें मौके से दूर रखा जाए।
पूर्व दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटर डैरिल कलिनन, जिन्होंने खुद कम उम्र में फर्स्ट क्लास क्रिकेट शुरू किया था, ने ESPNcricinfo के लिए लिखे अपने कॉलम में युवा खिलाड़ियों को बहुत जल्दी बड़े मंच पर लाने के खतरों पर बात की।
उन्होंने लिखा, “मेरी नजर में उसे अभी घर पर अपनी परीक्षाओं की तैयारी करनी चाहिए, दोस्तों के साथ गली क्रिकेट खेलना चाहिए और जब तक मौका है एक बच्चा बनकर रहना चाहिए। इसका मतलब उसकी प्रतिभा को नजरअंदाज करना नहीं है। इसका मतलब यह समझना है कि प्रतिभा तभी सही मायने में निखरेगी जब उसे संभालने वाला इंसान पूरी तरह विकसित हो सके।”
पूर्व भारतीय स्पिनर मनिंदर सिंह, जिन्होंने 17 साल की उम्र में भारत के लिए डेब्यू किया था, मानते हैं कि टीम में बने रहने के लिए प्रदर्शन और आत्मनियंत्रण सबसे जरूरी हैं।
उन्होंने PTI से कहा, “मुझे शुरुआती दो दौरों के बाद बाहर कर दिया गया था क्योंकि आठ टेस्ट में मैंने सिर्फ पांच विकेट लिए थे। मैं किसी को दोष नहीं दे सकता था। पाकिस्तान और वेस्टइंडीज में अंपायरिंग खराब थी, लेकिन सिर्फ वही कारण नहीं था। मैंने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया और मुझे जगह छोड़नी पड़ी।”
उन्होंने आगे कहा, “तब भी सपोर्ट सिस्टम था। लोग आकर कहते थे, ‘मन्नी, तुम्हें और मेहनत करनी होगी।’ अगर मुझे किसी को दोष देना है तो खुद को दूंगा। अब खिलाड़ियों के पास बेहतर सपोर्ट सिस्टम मौजूद है।”
वैभव सूर्यवंशी जैसी असाधारण प्रतिभा का सामने आना किसी भी खेल प्रेमी देश के लिए गर्व की बात है। लेकिन असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि खेल की व्यवस्था भी उतनी ही तेजी से विकसित हो जितनी तेजी से ये युवा खिलाड़ी आगे बढ़ रहे हैं।
जब भी कोई असाधारण किशोर खिलाड़ी रिकॉर्ड तोड़ता है, तो उसके आसपास मौजूद हर व्यक्ति की एक शांत लेकिन अहम जिम्मेदारी होती है — यह याद रखना कि देश के खेल का नया स्टार बनने से पहले वह अभी भी एक बच्चा है।







